तालिबान क्या हैं ?

 'तालिबान' शब्द का पश्तून में मतलब होता है ‘छात्र’ और इससे संगठन के सदस्यों की ओर इशारा किया जा रहा था जिन्हें मुल्ला मोहम्मद उमर का ‘छात्र’ माना गया। साल 1994 में उमर ने कंधार में तालिबान को बनाया था। तब उसके पास 50 समर्थक थे जो सोवियत काल के बाद गृहयुद्ध के दौरान अस्थिरता, अपराध और भ्रष्टाचार में बर्बाद होते अफगानिस्तान को संवारना चाहते थे। विदेश मामलों के जानकार कमर आगा बताते हैं कि तालिबान बहुत बड़ा गुट है जिसकी काउंसिल क्वेटा शूरा का हेडक्वॉर्टर पाकिस्तान के क्वेटा में है जो बलूचिस्तान की राजधानी है। संगठन के सारे लीडर वहीं रहते हैं और वहीं मिलते हैं । 

तालिबान का उदय कैसे हुआ ? 

सन् 1980 की दहाई में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में सेना उतारी थी , तब अमेरिका ने वहा‌‌ के मुजाहिदीनों लोगों के हाथों में हथियार  और ट्रेनिंग देकर युद्ध के लिए उकसाया था । परिणामस्वरूप , सोवियत संघ तो अफगानिस्तान से हार मानकर चला गया । लेकिन अफगानिस्तान में एक कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन का उदय हुआ, जिसे तालिबान के नाम से जाना गया । ऐसा माना जाता है कि तालिबान ने पाकिस्तान के मदरसों में शिक्षा ली , लेकिन इस पर पाकिस्तान का कहना है कि तालिबान के उदय में उसका कोई हाथ नहीं हैं । 

तालिबान का प्रमुख कौन हैं ? 

तालिबान का नेतृत्‍व क्‍वेटा शूरा नाम की काउंसिल करती है। यह काउंसिल क्‍वेटा से काम करती है। 2013 में तालिबान के संस्‍थापक मुल्‍ला उमर की मौत हुई और उसके उत्‍तराधिकारी मुल्‍ला अख्‍तर मंसूर को 2016 की ड्रोन स्‍ट्राइक में मार गिराया गया। तबसे मावलावी हैबतुल्‍ला अखुंदजादा तालिबान का कमांडर है। उमर का बेटा मुल्‍ला मोहम्‍मद याकूब भी हैबतुल्‍ला के साथ है। इसके अलावा तालिबान का सह-संस्‍थापक मुल्‍ला अब्‍दुल गनी बरादर और हक्‍कानी नेटवर्क का मुखिया सिराजुद्दीन हक्‍कानी भी तालिबान का हिस्‍सा है। 

तालिबान की कमाई 


तालिबान की कमाई काली है. दरअसल, तस्करी और अफीम उसकी कमाई का सबसे बड़ा स्रोत है. दरअसल, अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती होती है ।. अफीम की खेती पर तालिबान का कब्जा है , दुनिया की 80 फीसदी अफीम यहीं होती है। तालिबान अफीम को बेचकर और उसकी तस्करी करके बशुमार दौलत कमाता है. इस बात का जिक्र यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम (UNODC) भी अपनी रिपोर्ट में कर चुका है । 

                                    फोर्ब्स ने बताया है कि तालिबान का सालाना कारोबार 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर (29,71 करोड़ रुपए है) का है । तालिबान की इनकम के मुख्‍य जरिए इस प्रकार हैं:

 ड्रग्‍स :  हर साल 416 मिलियन डॉलर

खनन : पिछले साल 464 मिलियन डॉलर

रंगदारी : 160 मिलियन डॉलर

चंदा : 2020 में 240 मिलियन डॉलर

निर्यात : हर साल 240 मिलियन डॉलर

रियल एस्‍टेट : हर साल 80 मिलियन डॉलर

तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कैसे किया ?

अफगानिस्तान में तालिबान की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि अमेरिका के नेतृत्व में कई देशों की फौज के उतरने के बाद भी इसका खात्मा नहीं किया जा सका। तालिबान के मकसद की बात करें तो उसका एक ही मकसद है कि अफगानिस्तान में इस्लामिक अमीरात की स्थापना करना है । 
                                           अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ ही अफगानिस्तान एक बार फिर से युद्ध की आग में जल रहा है। तालिबान लड़ाके अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों पर कब्जा कर चुके हैं और अफगान सैनिक काबुल-कंधार जैसे बड़े शहरों को बचाने के लिए जंग लड़ रहे हैं । आज तालिबान ने अफगानिस्तान के बड़े इलाके पर कब्जा लिया हैं।  
अफगानिस्तान में जब युद्ध की नौबत आई तो सैनिकों के पास गोला-बारूद और खाने-पीने तक की चीजों की कमी हो गई। अमेरिका लौटने लगा तो अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी बिना संघर्ष खुद भाग खड़े हुए। नतीजा मुल्क की हार के रूप में सबके सामने है। बाइडन ने कहा, इसका अंदाजा नहीं था कि अफगान सरकार इतनी जल्दी घुटने टेक देगी। 


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